कोरोना का संकट और हम
सुबह उठने से लेकर रात में सोने जाते समय तक और रात में सपने में भी आम आदमी आज एक ऐसे तनाव ,परेशानी ,चिंता और किंकर्तव्यविमूढ़ता में जी रहा है जिसकी परिकल्पना पहले कभी नहीं थी और आज हालात ऐसे दिख रहे हैं कि निकट भविष्य में जल्दी इन समस्याओं से मुक्ति कदापि संभव नहीं है । सुबह जैसे ही नींद खुलती है तो एक ओर प्रदूषण मुक्त वातावरण में वासंती हवाएं मदमस्त करती हैं और कोयल की मधुर आवाज हमें अपनी ओर आकर्षित करती है तो दूसरी ओर सब्जी और ठेले वाले की अपने अपने सामान लेने / खरीदने की पुकार और दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों के माध्यम से सावधान करती हिदायत करती हुई विभिन्न प्रकार की खबरें और विज्ञापनों के प्रचार से भावुक मन बहुत कुछ सोचने के लिए विवश हो जाता है । उसी समय बगल की रहने वाली गरीब परिवार की एक बुढ़िया की दीन आवाज हमें अपनी ओर आकर्षित करती है और वह किंचित कुछ रुपयों की याचना करती है । मैं कुछ आश्वासन भरे शब्दों के साथ उसे यह कह कर विदा करता हूं कि मैं उसकी मदद अवश्य करूंगा । इस संबंध में मैं जब घर में कुछ चर्चा करता हूं तो सभी सहायता के लिए तत्पर दिखते हैं । किंतु सच्चाई यह है कि मेरे पास भी बहुत अधिक पैसे नहीं हैं और दो महीने से वेतन नहीं मिले हैं पर मुझे यह लगता है कि जरूरतमंदों की मदद अवश्य की जानी चाहिए । हमारी अंतरात्मा भी यही पुकार पुकार कर कह रही है कि हमें इस पुनीत कार्य में पीछे नहीं रहना चाहिए । तीन-चार दिन पूर्व एक दिव्यांग निर्धन बेरोजगार पड़ोसी मित्र का भी फोन आया था जिसमें उन्होंने आवश्यकता पड़ने पर मदद करने का आग्रह किया था । हालांकि 1000 -2000 रुपए किसी की मदद कर देने से मुझ पर आर्थिक बोझ बिल्कुल भी ना होगा । किंतु मुझे ऐसा लगता है कि करोना वायरस की वजह से लाक डाउन का समय अधिक बढ़ाया जाएगा तब निर्धन गरीब लाचार और रोजमर्रा की जिंदगी जीने वाले लोगों की क्या हालत होगी और वे आखिर किस से मदद की चाहना करेंगे ? उधर हर एक आम आदमी अपनी-अपनी समस्याओं से परेशान है । बाजार में केवल खाद्य वस्तुएं सब्जी और फल वगैरह मिल रहे हैं । दवाओं की दुकानें खुली हैं और लोग सोशल डिस्टेंसिंग के साथ आवश्यक वस्तुओं को खरीदने के लिए आ- जा रहे हैं। प्रश्न यह उठता है कि यदि आर्थिक रूप से लाचार और कमजोर वर्ग के लोग जिन्हें दवाओं और खाद्य वस्तुओं की जरूरत आ पड़ेगी तो वे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कैसे करेंगे ? कल एक बालक चिंतित होकर यह कह रहा था कि लॉक डाउन की तिथि आगे बढ़ने से भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। समाचारों के अवलोकन और लोगों से कोरोनावायरस से उत्पन्न मौजूदा हालात को देखते हुए मेरा भी मन डगमगाने लगा कि हो ना हो भूखमरी की स्थिति आ सकती है। हालांकि माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की पैनी सूझ-बूझ से अवश्य मौजूदा हालात पर काबू पाया जा सकेगा । यह जानते हुए भी कि यह स्थिति उन गरीब और निम्न मध्यवर्गीय परिवारों के लिए विशेष दुखद है जिनके रोजगार धंधे बंद पड़े हैं और वह केवल अपनी जमा पूंजी में से ही अपने परिवार का गुजर-बसर करेंगे और आगे अपने रोजगार को चलाने के लिए अनेक तरह के संकट का सामना करना पड़ेगा। आज की परिस्थितियां हमें आत्ममंथन के लिए प्रेरित कर रही हैं कि हमारे जो कर्तव्य हैं तथा अपने अपने स्तर से यदि कुछ किया जा सकता है तो हमें कदापि पीछे नहीं रहना चाहिए।
मनुष्य होने के नाते हमारे अपने कुछ कर्तव्य होते हैं और वह कर्तव्य है मानव जाति की सेवा में समर्पण के साथ आगे आकर कार्य करना। और यह कार्य आज हमारे चारों ओर विभिन्न स्तर के सामाजिक सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं कर रहे हैं और उनसे जुड़े हुए गणमान्य बुद्धिजीवी लोग इस कार्य में अपना हाथ बंटाते रहे हैं।आज यह स्थिति है कि आज पूरे मोहल्ले में जो फल और सब्जियां बेचने वाले लोग है वे अपनी जान को जोखिम में डालकर फल और सब्जियां बेच रहे हैं तथा लोगों की सेवा में लगे हुए हैं। फिर भी हमारे समाज का एक और तबका गरीबी की मार से जूझ रहा है जो व्यक्ति छोटे-छोटे उद्योग धंधों में लगे हुए और जो प्रतिदिन दूसरे दूसरे जगहों पर जाकर मेहनत मजदूरी करते हैं उनको काम नहीं मिल रहा है और वे हताश निराश होकर 2 जून की रोटी खाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। पटना के विभिन्न क्षेत्रों में झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले लोग पर्याप्त साधन और सुविधा के अभाव में भुखमरी के कगार पर पहुंच गए हैं उनके समक्ष एक और बीमारी है तो दूसरी ओर भोजन के सामग्री का भाव है उनके आसपास रहने के जो जगह हैं वहां भी गंदगी और दुर्गंध है और यही कारण है कि साफ सफाई के अभाव में उनकी जिंदगी खतरे में पड़ी हुई है। अशिक्षित होने की वजह से उन्हें सोशल डिस्टेंसिंग का ज्ञान भी नहीं है हल्का हुए कभी-कभी एक जगह इकट्ठे दिखलाई पड़ते हैं। थाना के स्थानीय पुलिस बल उनके लिए आटा चावल दाल तथा आलू की व्यवस्था तो कर रही है किंतु वह सामान पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है क्योंकि उनके पास पर्याप्त मात्रा में वस्त्र नहीं हैं पहने के कपड़े नहीं है खाने के लिए पौष्टिक भोजन नहीं है बीमार बच्चों और महिलाओं के लिए दवाई नहीं है और सबसे बड़ी बात क्या है कि उनमें जागरूकता का अभाव दिखलाई पड़ता है।
ऐसे लोगों के पास शुद्ध पीने के पानी की व्यवस्था भी नहीं है फलतः इन्हें कभी कभार प्यासे भी रहना पड़ता है। साबुन और सर्फ के अभाव में के कपड़े और शरीर गंदे दिखलाई पड़ते हैं। सोशल डिस्टेंसिंग का ज्ञान नहीं होने से यह ना केवल अपने लिए खतरा पैदा कर रहे हैं बल्कि यह दूसरों के लिए भी खतरनाक साबित हो सकते हैं। यद्यपि मध्यवर्गीय लोग अपनी जमा पूंजी से खाने-पीने का खर्चा निकाल रहे हैं किंतु जो सबसे निचला तबका है जो निम्न वर्गीय है तथा सड़कों के किनारे आवास बनाकर रहता है । इस समूह में कुछ ठेला चलाते हैं कुछ रिक्शा चलाते हैं कुछ टेंपो चलाते हैं और कुछ जानवर भी पालते हैं ऐसे लोगों के समक्ष जागरूकता पैदा करनी होगी ताकि कोरोना वायरस यहां वहां अधिक मात्रा में अपना फैलाव नहीं कर सके। मेरा ख्याल है कि इसके लिए स्थानीय शिक्षकों को इस काम में लगाया जा सकता है। शिक्षक यह काम पूरी ईमानदारी और मेहनत के साथ कर सकते हैं और उनकी बताई गई बातों का ऐसे निर्धन अशिक्षित गरीब लोगों का लोगों पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त सरकारी या गैर सरकारी शिक्षक चूँकि अभी विद्यालय बंद है , इस अवधि में हमारे शिक्षक समाज के अपने-अपने क्षेत्रों में आगे बढ़ कर पर्याप्त जागरूकता का कार्य कर सकते हैं तथा उनके प्रेरणा और प्रबल प्रोत्साहन के बल पर समाज के प्रत्येक वर्ग के लोग कोरोना वायरस से अपने आप को बचाने में ना केवल सफल होंगे बल्कि उनके इस परोपकार पूर्ण पावन कार्य से लोगों में जो तनाव, भय, भ्रम, संत्रास और किंकर्तव्यविमूढ़ता की जो स्थिति है उस पर काबू पाया जा सकता है। दूसरा दुखद पहलू यह है कि आज बिहार के नियोजित शिक्षक हड़ताल पर चल रहे हैं जिस वजह से उनके समक्ष भूखमरी की स्थिति पैदा हो गई है । अब तक प्राप्त आंकड़े बताते हैं कि पूरे बिहार में बयालीस नियोजित शिक्षक अपनी जान गवां चुके हैं और दर्जनों गंभीर बीमारियों के शिकार बने बैठे हैं। आज जबकि इस संकट की घड़ी में चारों ओर कोरोना वायरस की वजह से लोकडाउन की स्थिति है तथा विषम परिस्थितियां पैदा हो गई हैं तो ऐसे समय में सरकार का यह दायित्व बनता है कि वे शिक्षकों को हड़ताल समाप्त करने के लिए शिक्षक संगठनों को वार्तालाप के लिए आमंत्रित करें और शिक्षक समुदाय को निराशा और हताशा से बचाने के लिए सहयोग करें।
वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा लगता है कि पूरी दुनिया में करोना वायरस की वजह से भयावह स्थिति पैदा हो गई है जिससे निकट भविष्य में उबर पाना किसी भी व्यक्ति के लिए संभव नहीं लगता है। उधर भारत सरकार विभिन्न राज्यों में बंद को लेकर विभिन्न मुख्यमंत्रियों से सलाह मशविरा कर रहे हैं और जाहिर है कि लोक डाउन का समय और बढ़ाया जाएगा क्योंकि यदि शीघ्र इस पर विचार विमर्श नहीं किया जाएगा तो समाज में गुजर-बसर कर रहे विभिन्न तबके के लोगों को विभिन्न तरह के खतरनाक परिस्थितियों से रूबरू होना पड़ सकता है और उसकी भरपाई निकट भविष्य में बिल्कुल ही संभव नहीं होगी।
हम यह जानते हैं कि भारत गांवों का देश है और भारत की अधिकांश जनता गांव में निवास करती है। 70 से 75% जनता रोज कमाने और खाने वाले हैं वे रोजाना मेहनत मजदूरी करते हैं तथा उनके पास जमा पूंजी बिल्कुल भी नहीं है। इसके अलावा खेती करने वाले किसानों की स्थितियां भी काफी दुखद और चिंता पैदा करने वाली हैं क्योंकि वह पहले ही अपनी अपनी खेती बैंक से या सरकार से या अपने पड़ोसियों से कर्ज लेकर करते रहे हैं। इसी पैसे से उनके घरों में शादी विवाह और बच्चे या बड़ों के बीमार पड़ने पर देखभाल भी करना पड़ता है बच्चों की पढ़ाई भी इसी पैसे से होती है इसके अलावा कई तरह के पारिवारिक और सामाजिक दायित्व हैं जिसके लिए पैसे बचा कर रखना पड़ता है। इन दिनों जबकि कोरोना वायरस की भयावहता की गम्भीर स्थिति दिखाई पड़ रही है। ऐसे समय में केवल सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्थाओं के द्वारा आटा, चावल, दाल, तेल, आलू तथा दवाओं के द्वारा सहायता पहुंचाने मात्र से उनके जीवन से जुड़ी हुई विभिन्न समस्याओं और जीवन की आवश्यकताओ को कदापि पूरा नहीं किया जा सकता है; क्योंकि उनके समक्ष अभी भी भविष्य को लेकर ऊहापोह की स्थिति है। अनागत और अनिर्णीत आने वाले भविष्य के दुखों के पहाड़ का साया उनके समक्ष लहराता हुआ दिख रहा है। इसके अलावे गांव और शहर में काफी मात्रा में झुग्गी- झोपड़ी में रहनेवाले लोग दिन रात मेहनत मजदूरी करके अपना -अपना गुजर-बसर करते हैं । ऐसे लोगों के समक्ष भी खाने-पीने की समस्या आ गई है और दूसरी ओर इनके समक्ष तो ऐसे भी समस्याओं की बाढ़ मौजूद थी क्योंकि सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं केवल नाम मात्र के लिए ही राहत कार्य मुहैया कराते
रहे हैं क्योंकि जितनी मात्रा में उन्हें भोजन और पानी की जरूरत है उतनी सरकार की ओर से अथवा सामाजिक संस्थाओं की ओर से कदापि उपलब्ध नहीं कराई जाती है।
यहाँ लोग असीमित रूप से गरीब है। सरकार के पास पर्याप्त मात्रा में साधन नहीं है । सच तो यह है कि उतनी मात्रा में राहत सामग्री का उपलब्ध कराया जाना सरकार के लिए बिल्कुल ही असंभव प्रतीत होता है। इसके अलावा दूसरी ओर सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग सोशल डिस्टेंसिंग को तोड़ रहे हैं क्योंकि उन्हें इस बात की जानकारी ही नहीं है कि सोशल डिस्टेंस में अपनाए जाने से हम कोरोना वायरस के चक्र को तोड़ेंगे और उस पर हम अपनी विजय हासिल करेंगे । किंतु समाज का दुखद पहलू यह है कि हम एक दूसरे से बिल्कुल ही कटे हुए हैं। हम ना तो एक दूसरे की मदद कर रहे हैं ना तो एक दूसरे को सुझाव और सलाह के द्वारा करोना से बचने के लिए किसी तरह से प्रेरित ही कर रहे हैं । सोशल मीडिया पर प्रचलित वीडियो, व्हाट्सएप,फेसबुक एवं अन्य साधनों पर यह दिखाया जा रहा है कि पुलिस जनता के साथ बर्बरता के साथ पेश आ रही है। वह लाठी-डंडों से आंख मूंदकर पीटना शुरू कर दे रही है और वह यह नहीं देख पाती है कि कोई भी व्यक्ति यदि बाहर सड़कों पर निकला है तो इसके पीछे वास्तविक कारण क्या है? उसकी कौन सी जरूरतें ऐसी आन पड़ी थी कि उसे लॉकडाउन तोड़कर बाहर सड़कों पर आना पड़ गया है?
इस संदर्भ में यह बात भी कहना जरूरी जान पड़ता है कि जो भी पुलिस सड़कों पर सुरक्षा के लिए घूम रहे हैं उन्हें यह चाहिए कि वे जरूरतमंदों की आगे बढ़कर मदद करें। ऐसा भी देखने में आ रहा है कि कुछ लोग खाने-पीने की वस्तुएं लाने जा रहे हैं। दवाइयां लाने जा रहे हैं, अपने घर परिवार के सदस्यों से मिलने जा रहे हैं जो कहीं किसी स्थान पर भटके हुए रुके हुए अपने परिजनों की प्रतीक्षा में उनकी बाट जोह रहे हैं। इसके अलावा इन राहत कार्य के साथ-साथ आज मोबाइल के रिचार्ज करने का भी संकट आ गया है। जगह-जगह दुकानें बंद हैं और हरेक लोगों के पास अपना नेट बैंकिंग के माध्यम से उनका नाम गूगल पे या पेटीएम या भीम एप या तेज ऐप या किसी अन्य तरह की सुविधाएं ही नहीं हैं जिसके माध्यम से वे अपने -अपने मोबाइल को रिचार्ज कर सकें। इसके अलावा यह भी सरकार को ध्यान देना चाहिए कि मोबाइल की हर एक दुकान भी खोल कर रखें ताकि लोग अपने लिए नया मोबाइल ले सकें या खराब हो गया मोबाइल की मरम्मत भली-भांति पूर्वक करा सकें या अपना मोबाइल चार्जर या मोबाइल बैटरी या मोबाइल में पैसे भरवा सकें। सरकार को तो ऐसी स्थिति में चाहिए कि वह अखबार और मोबाइल तथा टीवी की भी दुकान खोल कर रखें ताकि आवश्यकता पड़ने पर वे जरूरी सूचनाओं के आदान-प्रदान करने के लिए मोबाइल खरीद सकें ; अखबार खरीद सकें या अपना टीवी मरम्मत करा सकें। इसके साथ-साथ यह भी जरूरी है कि सरकार इसके लिए निशुल्क व्यवस्था कराए। वे लोगों के लिए विभिन्न मोबाइल कंपनियों को ऐसा दिशा निर्देश दे कि आम आदमी जो गरीब है तथा जिनके पास साधन का अभाव है वह फ्री में अपना मोबाइल रिचार्ज कर सके अथवा हरेक कंपनियों को यह भी जरूरी है कि वह हरेक कंपनियों को यह निर्देश कर दें कि आधार के अनुसार जिनके मोबाइल नंबर हैं उन लोगों को उनकी आर्थिक स्थिति का मुआयना करके उन्हें मोबाइल बातचीत करने तथा इंटरनेट की सुविधाओं को अपनाने के लिए फ्री में व्यवस्था कर दे।
पंडित विनय कुमार
(हिन्दी शिक्षक )
शीतला नगर
रोड नंबर 6
पोस्ट- गुलजार बाग
अगमकुआँ
पटना
बिहार
पिन- 800007
मोबाइल- 9334504100
7991156839
ऐसे लोगों के पास शुद्ध पीने के पानी की व्यवस्था भी नहीं है फलतः इन्हें कभी कभार प्यासे भी रहना पड़ता है। साबुन और सर्फ के अभाव में के कपड़े और शरीर गंदे दिखलाई पड़ते हैं। सोशल डिस्टेंसिंग का ज्ञान नहीं होने से यह ना केवल अपने लिए खतरा पैदा कर रहे हैं बल्कि यह दूसरों के लिए भी खतरनाक साबित हो सकते हैं। यद्यपि मध्यवर्गीय लोग अपनी जमा पूंजी से खाने-पीने का खर्चा निकाल रहे हैं किंतु जो सबसे निचला तबका है जो निम्न वर्गीय है तथा सड़कों के किनारे आवास बनाकर रहता है । इस समूह में कुछ ठेला चलाते हैं कुछ रिक्शा चलाते हैं कुछ टेंपो चलाते हैं और कुछ जानवर भी पालते हैं ऐसे लोगों के समक्ष जागरूकता पैदा करनी होगी ताकि कोरोना वायरस यहां वहां अधिक मात्रा में अपना फैलाव नहीं कर सके। मेरा ख्याल है कि इसके लिए स्थानीय शिक्षकों को इस काम में लगाया जा सकता है। शिक्षक यह काम पूरी ईमानदारी और मेहनत के साथ कर सकते हैं और उनकी बताई गई बातों का ऐसे निर्धन अशिक्षित गरीब लोगों का लोगों पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त सरकारी या गैर सरकारी शिक्षक चूँकि अभी विद्यालय बंद है , इस अवधि में हमारे शिक्षक समाज के अपने-अपने क्षेत्रों में आगे बढ़ कर पर्याप्त जागरूकता का कार्य कर सकते हैं तथा उनके प्रेरणा और प्रबल प्रोत्साहन के बल पर समाज के प्रत्येक वर्ग के लोग कोरोना वायरस से अपने आप को बचाने में ना केवल सफल होंगे बल्कि उनके इस परोपकार पूर्ण पावन कार्य से लोगों में जो तनाव, भय, भ्रम, संत्रास और किंकर्तव्यविमूढ़ता की जो स्थिति है उस पर काबू पाया जा सकता है। दूसरा दुखद पहलू यह है कि आज बिहार के नियोजित शिक्षक हड़ताल पर चल रहे हैं जिस वजह से उनके समक्ष भूखमरी की स्थिति पैदा हो गई है । अब तक प्राप्त आंकड़े बताते हैं कि पूरे बिहार में बयालीस नियोजित शिक्षक अपनी जान गवां चुके हैं और दर्जनों गंभीर बीमारियों के शिकार बने बैठे हैं। आज जबकि इस संकट की घड़ी में चारों ओर कोरोना वायरस की वजह से लोकडाउन की स्थिति है तथा विषम परिस्थितियां पैदा हो गई हैं तो ऐसे समय में सरकार का यह दायित्व बनता है कि वे शिक्षकों को हड़ताल समाप्त करने के लिए शिक्षक संगठनों को वार्तालाप के लिए आमंत्रित करें और शिक्षक समुदाय को निराशा और हताशा से बचाने के लिए सहयोग करें।
वर्तमान स्थिति को देखते हुए ऐसा लगता है कि पूरी दुनिया में करोना वायरस की वजह से भयावह स्थिति पैदा हो गई है जिससे निकट भविष्य में उबर पाना किसी भी व्यक्ति के लिए संभव नहीं लगता है। उधर भारत सरकार विभिन्न राज्यों में बंद को लेकर विभिन्न मुख्यमंत्रियों से सलाह मशविरा कर रहे हैं और जाहिर है कि लोक डाउन का समय और बढ़ाया जाएगा क्योंकि यदि शीघ्र इस पर विचार विमर्श नहीं किया जाएगा तो समाज में गुजर-बसर कर रहे विभिन्न तबके के लोगों को विभिन्न तरह के खतरनाक परिस्थितियों से रूबरू होना पड़ सकता है और उसकी भरपाई निकट भविष्य में बिल्कुल ही संभव नहीं होगी।
हम यह जानते हैं कि भारत गांवों का देश है और भारत की अधिकांश जनता गांव में निवास करती है। 70 से 75% जनता रोज कमाने और खाने वाले हैं वे रोजाना मेहनत मजदूरी करते हैं तथा उनके पास जमा पूंजी बिल्कुल भी नहीं है। इसके अलावा खेती करने वाले किसानों की स्थितियां भी काफी दुखद और चिंता पैदा करने वाली हैं क्योंकि वह पहले ही अपनी अपनी खेती बैंक से या सरकार से या अपने पड़ोसियों से कर्ज लेकर करते रहे हैं। इसी पैसे से उनके घरों में शादी विवाह और बच्चे या बड़ों के बीमार पड़ने पर देखभाल भी करना पड़ता है बच्चों की पढ़ाई भी इसी पैसे से होती है इसके अलावा कई तरह के पारिवारिक और सामाजिक दायित्व हैं जिसके लिए पैसे बचा कर रखना पड़ता है। इन दिनों जबकि कोरोना वायरस की भयावहता की गम्भीर स्थिति दिखाई पड़ रही है। ऐसे समय में केवल सरकारी अथवा गैर सरकारी संस्थाओं के द्वारा आटा, चावल, दाल, तेल, आलू तथा दवाओं के द्वारा सहायता पहुंचाने मात्र से उनके जीवन से जुड़ी हुई विभिन्न समस्याओं और जीवन की आवश्यकताओ को कदापि पूरा नहीं किया जा सकता है; क्योंकि उनके समक्ष अभी भी भविष्य को लेकर ऊहापोह की स्थिति है। अनागत और अनिर्णीत आने वाले भविष्य के दुखों के पहाड़ का साया उनके समक्ष लहराता हुआ दिख रहा है। इसके अलावे गांव और शहर में काफी मात्रा में झुग्गी- झोपड़ी में रहनेवाले लोग दिन रात मेहनत मजदूरी करके अपना -अपना गुजर-बसर करते हैं । ऐसे लोगों के समक्ष भी खाने-पीने की समस्या आ गई है और दूसरी ओर इनके समक्ष तो ऐसे भी समस्याओं की बाढ़ मौजूद थी क्योंकि सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं केवल नाम मात्र के लिए ही राहत कार्य मुहैया कराते
रहे हैं क्योंकि जितनी मात्रा में उन्हें भोजन और पानी की जरूरत है उतनी सरकार की ओर से अथवा सामाजिक संस्थाओं की ओर से कदापि उपलब्ध नहीं कराई जाती है।
यहाँ लोग असीमित रूप से गरीब है। सरकार के पास पर्याप्त मात्रा में साधन नहीं है । सच तो यह है कि उतनी मात्रा में राहत सामग्री का उपलब्ध कराया जाना सरकार के लिए बिल्कुल ही असंभव प्रतीत होता है। इसके अलावा दूसरी ओर सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग सोशल डिस्टेंसिंग को तोड़ रहे हैं क्योंकि उन्हें इस बात की जानकारी ही नहीं है कि सोशल डिस्टेंस में अपनाए जाने से हम कोरोना वायरस के चक्र को तोड़ेंगे और उस पर हम अपनी विजय हासिल करेंगे । किंतु समाज का दुखद पहलू यह है कि हम एक दूसरे से बिल्कुल ही कटे हुए हैं। हम ना तो एक दूसरे की मदद कर रहे हैं ना तो एक दूसरे को सुझाव और सलाह के द्वारा करोना से बचने के लिए किसी तरह से प्रेरित ही कर रहे हैं । सोशल मीडिया पर प्रचलित वीडियो, व्हाट्सएप,फेसबुक एवं अन्य साधनों पर यह दिखाया जा रहा है कि पुलिस जनता के साथ बर्बरता के साथ पेश आ रही है। वह लाठी-डंडों से आंख मूंदकर पीटना शुरू कर दे रही है और वह यह नहीं देख पाती है कि कोई भी व्यक्ति यदि बाहर सड़कों पर निकला है तो इसके पीछे वास्तविक कारण क्या है? उसकी कौन सी जरूरतें ऐसी आन पड़ी थी कि उसे लॉकडाउन तोड़कर बाहर सड़कों पर आना पड़ गया है?
इस संदर्भ में यह बात भी कहना जरूरी जान पड़ता है कि जो भी पुलिस सड़कों पर सुरक्षा के लिए घूम रहे हैं उन्हें यह चाहिए कि वे जरूरतमंदों की आगे बढ़कर मदद करें। ऐसा भी देखने में आ रहा है कि कुछ लोग खाने-पीने की वस्तुएं लाने जा रहे हैं। दवाइयां लाने जा रहे हैं, अपने घर परिवार के सदस्यों से मिलने जा रहे हैं जो कहीं किसी स्थान पर भटके हुए रुके हुए अपने परिजनों की प्रतीक्षा में उनकी बाट जोह रहे हैं। इसके अलावा इन राहत कार्य के साथ-साथ आज मोबाइल के रिचार्ज करने का भी संकट आ गया है। जगह-जगह दुकानें बंद हैं और हरेक लोगों के पास अपना नेट बैंकिंग के माध्यम से उनका नाम गूगल पे या पेटीएम या भीम एप या तेज ऐप या किसी अन्य तरह की सुविधाएं ही नहीं हैं जिसके माध्यम से वे अपने -अपने मोबाइल को रिचार्ज कर सकें। इसके अलावा यह भी सरकार को ध्यान देना चाहिए कि मोबाइल की हर एक दुकान भी खोल कर रखें ताकि लोग अपने लिए नया मोबाइल ले सकें या खराब हो गया मोबाइल की मरम्मत भली-भांति पूर्वक करा सकें या अपना मोबाइल चार्जर या मोबाइल बैटरी या मोबाइल में पैसे भरवा सकें। सरकार को तो ऐसी स्थिति में चाहिए कि वह अखबार और मोबाइल तथा टीवी की भी दुकान खोल कर रखें ताकि आवश्यकता पड़ने पर वे जरूरी सूचनाओं के आदान-प्रदान करने के लिए मोबाइल खरीद सकें ; अखबार खरीद सकें या अपना टीवी मरम्मत करा सकें। इसके साथ-साथ यह भी जरूरी है कि सरकार इसके लिए निशुल्क व्यवस्था कराए। वे लोगों के लिए विभिन्न मोबाइल कंपनियों को ऐसा दिशा निर्देश दे कि आम आदमी जो गरीब है तथा जिनके पास साधन का अभाव है वह फ्री में अपना मोबाइल रिचार्ज कर सके अथवा हरेक कंपनियों को यह भी जरूरी है कि वह हरेक कंपनियों को यह निर्देश कर दें कि आधार के अनुसार जिनके मोबाइल नंबर हैं उन लोगों को उनकी आर्थिक स्थिति का मुआयना करके उन्हें मोबाइल बातचीत करने तथा इंटरनेट की सुविधाओं को अपनाने के लिए फ्री में व्यवस्था कर दे।
पंडित विनय कुमार
(हिन्दी शिक्षक )
शीतला नगर
रोड नंबर 6
पोस्ट- गुलजार बाग
अगमकुआँ
पटना
बिहार
पिन- 800007
मोबाइल- 9334504100
7991156839
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें